भारशिव वंश (नाग वंश) व राजा वीरसेन नाग वंश मगध साम्राज्य के निर्बल हो जाने पर भारत के विभिन्न प्रदेशों में जो अनेक राजवंश स्वतंत्र हो गये थे, उनमें विदिशा का 'नाग वंश' भी एक था। बाद में यह वंश पहले शकों की और फिर कुषाणों की अधीनता में चला गया। अब यौधेयों द्वारा कुषाणों के विरुद्ध विद्रोहकरने से जो अव्यवस्था उत्पन्न हो गयी थी, उससे लाभ उठाकर नागों ने अपनी शक्ति का विस्तार करना प्रारम्भ किया। ग्वालियर के समीप पद्मावती को उन्होंने अपना केन्द्र बनाया, और वहाँ से बढ़ते- बढ़ते कौशाम्बी से मथुरा तक के सब प्रदेशों को अपने अधीन कर लिया। इन प्रदेशों में उस समय कुषाणों का राज्य था। उन्हें परास्त कर नाग राजाओं ने अपने स्वतंत्र राज्य की नींव डाली। बाद में नाग पूर्व की ओर और भी आगे बढ़ते चले गये और मिर्जापुर ज़िले में विद्यमान कान्तिपुरी को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया। भारशिव ये 'नाग राजा' शैव धर्म को मानने वाले थे। इनके किसी प्रमुख राजा ने ...
कुछ राजपूत प्राचीन निवासियो कि संतान है अर्थात मध्य प्रान्त तथा दक्षिण के गोंड और भर क्रमश: उन्नति कर के अपने को राजपूत कहने लगे! बुन्देल खंड के चंदेल, दक्षिण के राष्ट्र कूट राजपूताने के राठोर और मध्यप्रांत के गोंड तथा भर यहाँ के राजपूत संतान है! ( अर्ली हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया चतुर्थ संस्करण) राजपूतो कि उत्पति गोंडा ख्ख्द और भर जाति से हुई है! यह भर जाति सूर्यवंशी, नागवंशी, भारशिव और बाद मे राजपुत्र कहलाई( देखे कंट्री बुसन तो दी हिस्ट्री ऑफ़ बुन्देल खंड , इंडियन अन्तेकर्री XXXII १९०८ पेज १३६,३७ ) !
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महाराजा भरद्वाज भर जाति का बलिदान अमर है ! वह देश के लिए था ! देश की रक्षा मे अनगिनत बलिदान चढ़ाने वाली जाति मे भर प्रथम थे ! भर जाति के सम्राटो का क्रमबद्ध इतिहास खोजना अति कष्ट साध्य कार्य है ! जब कही पर किसी सम्राटो का इतिहास प्राप्त भी होता है तो इसके संतति का कोई इतिहास नहीं मिलता है ! अतः वान्श्वाली का क्रम टुटा हुआ सा प्रतीत होता है ! भारशिव वंश के महाराजा भारद्वाज अवध के शासक थे ! महाराजा भारद्वाज के शासनकाल का निर्धारण करना बहुत मुस्किल है ! ऐसा माना जाता है की अवध क्षेत्र मे भर जाति की प्रधानता प्रगेतिहासिक काल से ही थी ! वे अवध से लेकर नेपाल की सीमा तक फैला हुआ था ! टालमी ने जो भारत का मानचित्र अपने प्रवास के दौरान बनाया था जिसका प्रकासन : इंडियन एंटीक्वेरी" मे वर्गीज द्वारा किया गया है ! उनके अनुसार भरदेवी आज का भरहुत ही है जिसे भरो ने बसाया था ! इसकी संपुष्टि जनरल कनिम्घम ने " अर्किलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया" मे किया था ! "बंगाल एसियाटिक जनरल वोलुम XVI , पृष्ट ४०१-४१६ ) मे भी इस तथ्य को स्वीकार किया गया है !महाराजा भारद्वाज उसी काल मे भारशिवो मे ए...
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